मेरी इंदौर यात्रा:-
दिनांक 14-6-2011 से
दिनांक 23-6-2011
मैं इंदौर,म0प्र0
का रहने वाला हूँ. 1970 तक मैं इंदौर में
ही रहा और मिडिल स्तर तक मेरी शिक्षा भी इंदौर में ही हुई। 1970 के बाद मैं दिल्ली
चला गया और आगे की मेरी शिक्षा दिल्ली में ही हुई। तब से मैं दिल्ली में ही पूरी
तरह से स्थापित हो गया हॅूं। 1970 के बाद से 15-20 वर्षों के मध्यांतर से केवल
2बार मैं इंदौर जा पाया हॅूं। बेसिक शिक्षा इंदौर में होने के कारण इंदौर शहर औेर
आसपास के इलाके से मैं पूरी तरह से परिचित था। इसलिये 1970 के आसपास की इंदौर की
तस्वीर मेरे मस्तिष्क पटल पर स्पष्ट रुप
से चिंहित थी।
मेरे पुराने बचपन के
मित्र - सहपाठी अब सभी विवाहित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अपने बच्चों और पारिवारिक
सदस्यों के साथ आम आदमी की तरह जीवन यापन कर रहे है। उनके बच्चों के बच्चे भी हो
चुके हैं। तीसरी पीढ़ी के हाथ में बागडोर सौंपने की तैयारी चल रही है।
मुझे इंदौर गये काफी
समय हो गया था। कई वर्षों तक इंदौर में रहने के बावजूद भी ऐसे आसपास के कई धार्मिक
स्थल हैं जो कि मैं कभी नहीं देख पाया था। इसलिये इस बार मैं इंदौर के आसपास की
धार्मिक यात्रा करना चाहता था। ग्रीष्म अवकाश का समय होने के कारण रेल्वे आरक्षण नहीं
हो पा रहा था। विशेष प्रयास करने के बाद दिनांक 14-6-2011 को इंदौर का आरक्षण हो पाया। मैं और मेरी पत्नि दोनों विवाह के बाद
पहली बार इंदौर जा रहे थे। इंदौर के लिये हमने अपना आठ दिन का दैनिक कार्यक्रम
बनाया था और तदनुसार मैंने अपने मित्रों और संबंधियों को सूचित कर दिया था। काफी
लंबे समय के बाद मैं इंदौर जा रहा था, अतःमिलने के लिये सभी बेहद उत्सुक थे।
15-6-2011 की सुबह करीब आधा घंटा देरी से हमारी ट्रेन इंदौर पहुंची। स्टेशन पर १००-१२५
परिचित जो पहले से ही इंतजार कर रहे थे, एक लम्बे अर्से के बाद सभी लोगों से
मुलाकात हुई और सभी ने हमारा हार्दिक स्वागत किया। अपने निर्धारित कार्यक्रम के
अनुसार उस दिन काफी थकान होने के कारण हम पूरी तरह से विश्राम ही किये।
किंतु अगले दिन प्रातः
ही एक स्थानीय मित्र के साथ, स्थानीय बस के द्वारा हम धार-टवलाई-मनावर जा
पहुंचे। वहां सामाजिक कार्य से जुड़ी कुछ संस्थाओं का अवलोकन करना था। रात वहीं
रुके। अगले दिन प्रातःकुछ स्थानीय लोगों के साथ पहली बार नर्मदा में स्नान किया और
पानी में तैरने का आनंद भी उठाया।
दोपहर के बाद हम वापस
इंदौर के लिये रवाना हो गये। इंदौर शहर से कुछ दूरी पर स्थित एक छोटा सा ग्राम जो
की कस्तूरबाग्राम के नाम से मशहूर है, वहां गए.१९६७-६८ के दशक में मेरी बेसिक
शिक्षा यहीं पर हुई थी. कुछ घंटों तक कस्तूरबाग्राम में रहा। कई पुराने
मित्रों से उनके घर पर जाकर मुलाकात हुई।
बचपन के वे दिन याद आ रहे थे, जो कभी हमने साथ में मिल के गुजारे थे, अपनी नगरी होने के कारण
कस्तूरबाग्राम का अवलोकन किया। 1970 के दशक के पुराने और प्रतिष्ठित सर्वोदय के
प्रतिष्ठित संचालक स्व0श्री श्यामलालजी की याद आ रही थी। वहां की वर्तमान
प्रबंधकीय व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त की। बीस वर्पों में सब कुछ बदल
चुका था। कई-कई बार बदलती हुई नई व्यवस्था के नीतिगत फैसलों और वित्तिय संकट और
कुरीतियों के कारण नई व्यवस्था ने पुरानी आदर्श व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। रौनक
खत्म हो चुकी है, संस्था
की प्रतिष्ठा भी दिन पर दिन गिरती जा रही है, या यों कहिये कि अब इन संस्थाओं की
केवल सांस चल रही है, वह भी किसी तरह। पुराने बुध्दिजीवी और सामाजिक
उत्थान की सोच रखने वाले एक-एक कर इस दुनियां से चले गये। उसकी जगह आने वाले नये
व्यक्ति नई सोच के साथ आये, जिनका लक्ष्य समाज सेवा
के नाम पर केवल धनोपार्जन करना मात्र है। केवल कस्तूरबा ग्राम ही नहीं बल्कि देश के
सभी जगहों पर गांधीयन सामाजिक संस्थाओं का यही हाल है। समाज सेवा और विकास के नाम
पर लीपापोती या कागजी औपचारिकता पूरी कर दी जाती है।
कस्तूरबा ग्राम से ३
किलोमीटर की दूरी पर “सर्वोदय शिक्षण समिति” है. १९५२-५३ के दशक में श्री विनोबा
भावे ने इसकी नीव रखी थी. कड़ी ग्रामोद्योग से सम्बंधित खादी वस्त्रों की बुनाई का
प्रशिक्षण यहाँ दिया जाता रहा है. यहीं पर खादी ग्रामोद्योग की एक इकाई “खाद्य और
अखाद्य “तेल घानी संशोधन केंद्र” भी था
जहाँ पर सभी तरह के खाद्य तेल का प्रमुख केंद्र था . इंदौर शहर में यही एक
मात्र केंद्र था जो पूरे शहर में खाद्य तेल की पूर्ती किया करता था. किन्तु अब सब
ख़त्म हो चुका है. न वे लोग रहे और न ही वे योजना रही.
जहाँ तक विकास की बात
है तो मैंने पाया की पिछले १०-१५ वर्षों में सड़कों, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार,
स्वास्थ्य आदि सभी क्षेत्रों में अच्छा विकास हुआ है, किन्तु अभी बहुत कुछ बाकी
है. मै कह सकता हूँ की मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कई सराहनीय कार्य
किये हैं और प्रयत्नशील हैं.
जय हिन्द.
विनोद कुमार
दिल्ली
२५-६-२०११.
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