Sunday, February 5, 2017





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Friday, February 3, 2017

key words.




लहरों के साथ तो सभी चलते हैं..
लेकिन लहरों के विपरीत
चलने वाला ही महान बनता है"



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Vinod Kumar Mallik
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Saturday, December 29, 2012

जब फांसी ही देना है तो क्यों न बिना किसी भेद-भाव के सभी बलात्कारियों,हत्यारों और करोड़ों का घोटाले करने वालों को समान रुप से फांसी की सजा दी जाये। कानून पर अमल सब के लिये होना चाहिये, केवल गरीब और असहाय के लिये नहीं।





दिनांक - 29-12-2012

वेदना हो या दामिनी, घटना-क्रम से दिल दहल गया। सदमा इतना गहरा है कि लिखना भी चाहूं तो कलम-बध्द करने की हिम्मत नहीं होती। इस दौरान दिल्ली की पुरानी गीता-चोपड़ा की कहानी भी याद आ गई। तब से आज तक एक लंबा वक्त गुज़र गया है,यदि तभी से सख्ती बरकरार रहती तो आज दामिनी के साथ ऐसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होती। इस दौरान बलात्कार-हत्या  के कई घटनायें  केवल दिल्ली में ही हुई है। यह सरकारी- तंत्र  की पूरी तरह से पोल खोल देती हैं।
आखिर, बलात्कार की शिकार महिला ने भरसक जीवन-संघर्ष के बावजूद आज सिंगापुर के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली और हम सभी पर एक काला धब्बा लगाकर स्वयं हमेशा-हमेशा के लिये इस दुनियां से चली गई। इसकी दर्दनाक कहानी एक नया इतिहास रच गई है और इस देश के राजनेताओं और कानूनविदों को मजबूर कर ऐसा सबक देकर गई है, कि यदि वे जीवित भी रहेंगे तो पापी होने के साथ ही सारा जीवन अपने आपको माफ नहीं कर पायेंगे और स्वयं ही कोसेंगे। मेरे पास शब्द  नहीं हैं कि इस दर्दनाक हादसे को किन शब्दों में वर्णित  करुं।
हमें अब सोचना ही नहीं होगा बल्कि सख्त कदम भी उठाना ही होगा।
इस समय पूरा देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। पूरा विश्व इस हादसे को गंभीरतापूर्वक देख रहा है। यह भी देख रहा है कि भारतीय राजनेता और कानूनविद् किस तरह से स्वार्थवश अपने दिमाग का कितना सदुपयोग और कितना दुरुपयोग करते हैं। भारतीय- तंत्र अब पूरी तरह से असफल हो चुका है, इसका पुनर्गठन आवश्यक हो गया है।
निस्संदेह इस अपराध के गुनाहगारों को  क्रूरतम सख्त से सख्त या फांसी की सजा होनी चाहिये। पूरे देश में इसमें लिप्त सभी अपराधी को फांसी की सजा देने के लिय आवाज और प्रदर्शन किये जा रहे हैं। सरकार भी गंभीरता पूर्वक विचार कर रही है, संभवतःइन लोगों को फांसी ही हो। अब प्रश्न यह उठता है कि फांसी सिर्फ इस महिला के अपराधियों को ही क्यों हो, जिंहोंने सिर्फ बलात्कार किया है, और उन राजनेताओं या हत्यारों को क्यों नही हो, जो कि  रसूखदार सामाजिक हैसियत रखनेवाले हैं और कई अन्य बलात्कार और हत्या जैसे दो जघन्य अपराध में लिप्त हैं, और या तो जेल में खानापूर्ति के नाम पर सजा काट रहे हैं, या कुछ दिन जेल में रहकर अब फिर आजाद भारत का आनन्द ले रहे हैं या फिर कोई अन्य नया जघन्य अपराध करने का फितूर उन के दिमाग में चल रहा है। हाल में ही पंजाब, हरियाणा, 0प्र0 तथा  देश  के कुछ अन्य प्रांतों में भी बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध में हमारे कई रसूखदार सामाजिक हैसियत वाले नेता लिप्त पाये गये हैं, कुछ जेल में हैं कुछ सजा काट रहे हैं कुछ सजा काट चुके हैं किंतु उन्हें फांसी नहीं, जबकि उन सभी को भी फांसी ही होनी चाहिये, चाहे वे कितने भी  सामाजिक प्रभावशाली या संपन्न वर्ग से क्यों न हों। फांसी केवल ग़रीब या असहाय के लिये नहीं होनी चाहिये अन्यथा न्याय-तंत्र से नागरिकों का विश्वास उठ जायेगा।
प्रायः यह देखा गया है जघन्य अपराधी होने के बावजूद भी, प्रभावशाली राजनेता लोग स्वयं भी या अपने निकट के संबंधियों को हर हालात में काम,दाम,दंडभेद की नीति अपनाकर अपने चहेतों को कानूनी दांव-पेंच में कमी दिखाकर या उलझाकर अपने चहेतों को तो बचा लेते  हैं, किंतु पारिवारिक पारंपरिक दरिद्रता,अज्ञानता,और कुसंगति में पड़कर गुमराह  किये गये गरीबी से तृप्त लोग ही अपराधी की श्रेणी में आकर फांसी के फंदे तक पहुंच पाते हैं या पहुंचा दिये जाते हैं. चाहे वह  निर्दोष ही क्यों न हों, किंतु उसके बचाव पक्ष में कोई पहल नहीं करता यहां तक की कानूनी पहल करनेवाले वकील भी उचित  धनराशी के न मिलने के कारण उसमें रुचि नहीं लेते या केवल औपचारिकता पूरी करने के लिये कोई व़कील का इंतजाम भी कर दिया जाता है जिसका फैसला पहले से ही तय किया जा चुका होता है। उसे बचाने के लिये समाज का कोई प्रभावशाली व्यक्ति या राजनेता पहल नहीं करता। इस देश में अब तक जितने भी अपराधियों को फांसी की सजा दी गई है, वे सभी शत-प्रतिशत समाज के निम्नवर्ग के दरिद्रता के शिकार ही रहे हैं। घर-परिवार, शिक्षा-जगत उज्जवल-भविष्य जैसे सपनों से इनका कभी कोई लेना-देना नहीं रहा। अशिक्षित होने के कारण कूद पड़े आपराधिक दुनियां में और एक के बाद एक रिकार्ड बनाते चले गये अपराध जगत में और जब तक कुछ समझ पाते तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और पहुंच जाते हैं आजीवन कारावास या फांसी के फंदे तक। उनके परिवार में कभी भी कोई शिक्षित नहीं रहा। मुझे नहीं लगता की इस देश में शायद ही किसी आयकर दाता को कभी फांसी लगी हो।
हम सभी को सरकार से यह मांग करनी चाहिये और सरकार को भी इसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिये कि बलात्कारी और हत्या के सभी अपराधियों को एक समान रुप से फांसी की सजा दी जाये न कि सिर्फ इसलिये क्योंकि वह गरीब या असहाय परिवार का मानकर उसे फांसी दे दी जाये। फांसी किसी व्यक्ति विशेष को नहीं दी जानी चाहिये अन्यथा ये भेद-भाव तो होगा ही, साथ ही न्याय तंत्र पर से सामाजिक  विश्वास उठ जायेगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा की कहीं कोई निर्दोष व्यक्ति तो फांसी के फंदे पर नहीं चढ़ रहा या चढ़ाया गया। क्योंकि मत भूलिये की फांसी भी एक कानूनी हत्या ही है। जिसका शत-प्रतिशत न्याय तो केवल विधाता की अदालत ही कर सकती है की कौन कितना गुनाहगार है और कौन निर्दोष.
अंत में एक बात और कहना चाहूंगा कि महिलाओं को भी वक्त और परिस्थिति को देखते हुए अब पहले से ज्यादा जागरुक और सचेत होना होगा। सिर्फ सरकारी  तंत्र के भरोसे पर निर्भर न रहें। अपनी चारों ओर की स्थिति और हालात को देखकर ही उचित निर्णय लें। हर जगह जाने से तब तक बचें जब तक कि वह अत्यावश्यक न हो।
यह भी याद रखें कि समाज में ऐसी महिलाओं की भी कोई कमी नहीं हैं जिनका लक्ष्य समाज में गंदगी को फैलाकर केवल पैसा कमाना मात्र है। इस जाल में प्रायः पुरुप फंसते ही फंसते हैं। उनकी अपनी एक अलग दुनियां है। इस तरह की महिलायें निम्न वर्ग में भी हैं और उच्च वर्ग में भी हैं। निम्न वर्ग वालों की तो मज़बूरी समझ में आती है, किंतु जब संपन्न वर्ग की महिलायें भी ऐसे कार्य करती हैं तो सोचने को मजबूर होना हमारी भी एक मजबूरी है। शारीरिक बीमारी का तो ईलाज किया जा सकता है, किंतु जब यह मामला शौकियाना, या समय पास करना या पैसे कमाने की भूख का हो तो बेहद चिंतनीय है। इस तरह की मानसिकता वर्ग की महिलाओं के लिये भी कुछ आवश्यक कदम उठाने के लिये पहल होनी चाहिये। ताली हमेशा दोनों ही हाथों से बचती है। देश में महिला संगठनों की कमी नहीं है, इस पर नियंत्रण के लिये योजनाओं में फंड की कोई कमी भी नहीं है। हर वर्ष इन कार्यों के लिये सरकारी सहायता बढ़ती जाती है किंतु परिणाम शून्य. ये संगठन भी इस समस्या को रोकने में असफल रहे हैं। जो महिलायें फांसी की आवाज उठा रही हैं उन्हें इस पर भी विचार करना चाहिये। अधिकांश मामलों में पुरुष आपराधिक पहल करते हैं लेकिन सभी मामलों में नहीं। ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें महिलाओं ने पहल कर के अंजाम दिया।
बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध के बाद यह भी प्रश्न उठता है कि ऐेसे आर्थिक अपराधी जो करोड़ों से ज्यादा का गबन या दुरुपयोग या घौटालों में  लिप्त हों उन्हें क्यों छोड़ा जाये। क्या कुछ दिनों या वर्षों के लिये उन्हें सिर्फ सलाखों के पीछे भेजना मात्र ही पर्याप्त है, नहीं, कतई नहीं। उन्हें भी फांसी या आजीवन कारावास तो होना ही चाहिये। क्योंकि करोड़ों का अपराधी तो हजारों घरों को उजाड़ देता है, जबकि बलात्कारी या हत्यारे तो एक या दो परिवारों को ही बरबाद कर पाते हैं।
अंत में देश के सभी नागरिकों से अपील करता हूं कि इस गंभीर और विवादास्पद मामले पर गंभीरतापूर्ण विचार कर अपनी भावना व्यक्त करें. ऐसे निर्णय उहापोह में नहीं लिये जा सकते। यह एक अत्यंत ही संवेदनशील मामला है। हर निर्णय के बाद के परिणाम को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए निर्णय से पहले ही उससे होने वाले परिणाम की कल्पना अवश्य होनी चाहिए. बिना दूरदृष्टि के यह संभव नहीं हैं.

विनोद कुमार
3-गांधी स्मारक निधि

दिल्ली-110002














Wednesday, August 29, 2012

My Indore Journey








मेरी इंदौर यात्रा:-
दिनांक 14-6-2011 से दिनांक 23-6-2011
मैं इंदौर,म0प्र0 का रहने वाला  हूँ. 1970 तक मैं इंदौर में ही रहा और मिडिल स्तर तक मेरी शिक्षा भी इंदौर में ही हुई। 1970 के बाद मैं दिल्ली चला गया और आगे की मेरी शिक्षा दिल्ली में ही हुई। तब से मैं दिल्ली में ही पूरी तरह से स्थापित हो गया हॅूं। 1970 के बाद से 15-20 वर्षों के मध्यांतर से केवल 2बार मैं इंदौर जा पाया हॅूं। बेसिक शिक्षा इंदौर में होने के कारण इंदौर शहर औेर आसपास के इलाके से मैं पूरी तरह से परिचित था। इसलिये 1970 के आसपास की इंदौर की तस्वीर मेरे  मस्तिष्क पटल पर स्पष्ट रुप से चिंहित थी।

मेरे पुराने बचपन के मित्र - सहपाठी अब सभी विवाहित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अपने बच्चों और पारिवारिक सदस्यों के साथ आम आदमी की तरह जीवन यापन कर रहे है। उनके बच्चों के बच्चे भी हो चुके हैं। तीसरी पीढ़ी के हाथ में बागडोर सौंपने की तैयारी चल रही है।
मुझे इंदौर गये काफी समय हो गया था। कई वर्षों तक इंदौर में रहने के बावजूद भी ऐसे आसपास के कई धार्मिक स्थल हैं जो कि मैं कभी नहीं देख पाया था। इसलिये इस बार मैं इंदौर के आसपास की धार्मिक यात्रा करना चाहता था। ग्रीष्म अवकाश का समय होने के कारण रेल्वे आरक्षण नहीं हो पा रहा था। विशेष प्रयास करने के बाद दिनांक 14-6-2011 को इंदौर का आरक्षण  हो पाया। मैं और मेरी पत्नि दोनों विवाह के बाद पहली बार इंदौर जा रहे थे। इंदौर के लिये हमने अपना आठ दिन का दैनिक कार्यक्रम बनाया था और तदनुसार मैंने अपने मित्रों और संबंधियों को सूचित कर दिया था। काफी लंबे समय के बाद मैं इंदौर जा रहा था, अतःमिलने के लिये सभी बेहद उत्सुक थे। 15-6-2011 की सुबह करीब आधा घंटा देरी से हमारी ट्रेन इंदौर पहुंची। स्टेशन पर १००-१२५ परिचित जो पहले से ही इंतजार कर रहे थे, एक लम्बे अर्से के बाद सभी लोगों से मुलाकात हुई और सभी ने हमारा हार्दिक स्वागत किया। अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उस दिन काफी थकान होने के कारण हम पूरी तरह से विश्राम ही किये।
किंतु अगले दिन प्रातः ही एक स्थानीय मित्र के साथ, स्थानीय बस के द्वारा हम धार-टवलाई-मनावर जा पहुंचे। वहां सामाजिक कार्य से जुड़ी कुछ संस्थाओं का अवलोकन करना था। रात वहीं रुके। अगले दिन प्रातःकुछ स्थानीय लोगों के साथ पहली बार नर्मदा में स्नान किया और पानी में तैरने का आनंद भी उठाया।
दोपहर के बाद हम वापस इंदौर के लिये रवाना हो गये। इंदौर शहर से कुछ दूरी पर स्थित एक छोटा सा ग्राम जो की कस्तूरबाग्राम के नाम से मशहूर है, वहां गए.१९६७-६८ के दशक में मेरी बेसिक शिक्षा यहीं पर हुई थी. कुछ   घंटों तक कस्तूरबाग्राम में रहा। कई पुराने मित्रों से उनके घर पर जाकर मुलाकात हुई।  बचपन के वे दिन याद आ रहे थे, जो कभी हमने साथ में मिल के गुजारे थे, अपनी नगरी होने के कारण कस्तूरबाग्राम का अवलोकन किया। 1970 के दशक के पुराने और प्रतिष्ठित सर्वोदय के प्रतिष्ठित संचालक स्व0श्री श्यामलालजी की याद आ रही थी। वहां की वर्तमान प्रबंधकीय व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त की। बीस वर्पों में सब कुछ बदल चुका था। कई-कई बार बदलती हुई नई व्यवस्था के नीतिगत फैसलों और वित्तिय संकट और कुरीतियों के कारण नई व्यवस्था ने पुरानी आदर्श व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। रौनक खत्म हो चुकी है, संस्था की प्रतिष्ठा भी दिन पर दिन गिरती जा रही है, या यों कहिये कि अब इन संस्थाओं की केवल सांस चल रही है, वह भी किसी तरह। पुराने बुध्दिजीवी और सामाजिक उत्थान की सोच रखने वाले एक-एक कर इस दुनियां से चले गये। उसकी जगह आने वाले नये व्यक्ति नई सोच के साथ आये, जिनका लक्ष्य समाज सेवा के नाम पर केवल धनोपार्जन करना मात्र है। केवल कस्तूरबा ग्राम ही नहीं बल्कि देश के सभी जगहों पर गांधीयन सामाजिक संस्थाओं का यही हाल है। समाज सेवा और विकास के नाम पर लीपापोती या कागजी औपचारिकता पूरी कर दी जाती है।
कस्तूरबा ग्राम से ३ किलोमीटर की दूरी पर “सर्वोदय शिक्षण समिति” है. १९५२-५३ के दशक में श्री विनोबा भावे ने इसकी नीव रखी थी. कड़ी ग्रामोद्योग से सम्बंधित खादी वस्त्रों की बुनाई का प्रशिक्षण यहाँ दिया जाता रहा है. यहीं पर खादी ग्रामोद्योग की एक इकाई “खाद्य और अखाद्य “तेल घानी संशोधन केंद्र” भी था  जहाँ पर सभी तरह के खाद्य तेल का प्रमुख केंद्र था . इंदौर शहर में यही एक मात्र केंद्र था जो पूरे शहर में खाद्य तेल की पूर्ती किया करता था. किन्तु अब सब ख़त्म हो चुका है. न वे लोग रहे और न ही वे योजना रही.
जहाँ तक विकास की बात है तो मैंने पाया की पिछले १०-१५ वर्षों में सड़कों, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य आदि सभी क्षेत्रों में अच्छा विकास हुआ है, किन्तु अभी बहुत कुछ बाकी है. मै कह सकता हूँ की मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कई सराहनीय कार्य किये हैं और प्रयत्नशील हैं.
जय हिन्द.

विनोद कुमार
दिल्ली
२५-६-२०११.











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Human Nature, Symptoms and Sucess




व्यक्तिगत गुण, लक्षण और सफलता

क्या हम लोगों ने कभी यह जानने का प्रयास किया है कि आखिर वह क्या कारण है जिसकी वजह से निरंतर प्रयास और मेहनत करने के बावजूद भी हम जीवन में सफल नहीं हो पाते हैं।
हर व्यक्ति का स्वभाव अलग अलग होता है। कुछ लोगों के स्वभाव में कुछ विशेषता या विशेष प्रकार के दोष  होते हैं, और  ये लक्षण उनके पारिवारिक संस्कार, व्यक्तिगत गुण और व्यक्तिगत आदतों पर निर्भर होते हैं.  ये लक्षण एक तरह से प्राकृतिक या ईश्वरीय उपहार की तरह होते हैं, चाहते हुए भी किसी भी तरह से इसे बदला नहीं जा सकता, किंतु यदि व्यक्ति चाहे तो कुछ सावधानी और निरंतर प्रयास से काफी हद तक इसे सुधारा अवश्य  जा सकता है और उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते  हैं. असफलता को सफलता में बदला जा सकता है। किसी भी व्यक्ति के सफल और असफल जीवन के लिये यही लक्षण मुख्य रुप से जिम्मेदार होते हैं। समय और परिस्थिति के अनुसार इन लक्षणों का फायदा उठाना चाहिये, किंतु विपरीत परिस्थिति  में इसे नज़रअंदाज नहीं करना चाहिये या परिस्थिति के अनुसार नजरअंदाज भी  आवश्यक हो तो बचना ही उचित होगा। उचित उपाय करने चाहिये जो कि संभव है, अन्यथा सारा जीवन का  बहुमूल्य समय व्यर्थ जायेगा और पछताने के अलावा कुछ भी हासिल नहीं हो सकेगा।
आम दैनिक जीवन में ऐसे कई उदाहरण दिये जाते  हैं कि जीवन की सफलता का मूल मंत्र केवल कड़ी मेहनत है। बात सही है, लेकिन फिर भी यह एक यह एक विवादास्पद मुद्दा है, जिस पर हर व्यक्ति तर्क के आधार पर यह सिध्द करने का प्रयास करता है कि मेहनत ही सब कुछ है़, जबकि मेहनत भी बहुत कुछ है, तर्क को कुछ हद तक माना जा सकता है। मैं इस विवाद में पड़ना नहीं चाहता। किंतु मैं इससे सहमत नही हॅूं और न ही तर्क के आधार पर दिया गया निर्णय को मैं अंतिम मानता हूं। क्योंकि अगर मेहनत ही सब कुछ है तो बेचारे गधे, घोड़े, बैल, उंट,खच्चर आदि कुछ ऐसे जानवर हैं जिससे ज्यादा मेहनत शायद ही कोई करता होगा। इसके बावजूद भी उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं होता। संभवतःवे किसी दैविक-शक्ति के अभिशाप से ग्रस्त हों, और कब उसके जीवन में उध्दार होगा या उसे इस कष्ट से मुक्ति मिलेगी, कोई नहीं जानता। मनुष्य और जानवर के मामले में यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि जानवर मेहनत तो करता है परंतु ज्ञान नहीं होने के कारण उसे अच्छे और बुरे की पहचान करने की शक्ति नहीं होती और निरंतर एक मशीन की तरह अपना काम, बिना कुछ प्राप्ति की उम्मीद के,  बिना किसी फल की चाह किये जुटा रहता है, किंतु हम इंसानों को अच्छे-बुरे की पहचान करने के लिये, उचित परिणाम प्राप्त करने के लिये  इश्वर ने दिमाग के रुप में सोचने और समझने की शक्ति प्रदान की है, जिसका सदुपयोग कर के हम मनचाहा परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। इस दुनियां में ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं है जो इस दिमाग का दुरुपयोग कर के छोटा रास्ता बनाकर जल्दी से जल्दी मंजिल को प्राप्त करने की दौड़ में बीच में ही किसी अन्य उलझन में उलझ कर,बिन बुलाई मुसीबत में पड़कर, उसे सुलझाने में ही इतना वक्त लगा देते हैं कि इससे कम समय में वे सही रास्ते से होकर आसानी से मंजिल को प्राप्त कर सकते थे। अब प्रश्न यह उठता है कि इंसानों में भी सभी इंसान तो अपने जीवन में सफल नहीं हैं, जबकि दिमाग तो इश्वर ने सभी इंसानों को दिया है, फिर क्या कारण है सफलता और असफलता के!
जानवरों को दिमाग नहीं होने के कारण वे अपने जीवन में असफल हैं जबकि इंसानों में दिमाग होने के बावजूद भी सारे के सारे इंसान सफल क्यों नहीं हैं! यह कुदरत का एक ऐसा गणित है जिसे इंसान दिमाग होने के बावजूद आज तक नहीं सुलझा पाया है, और कुदरत ने इंसानों को इसे सुलझाने में ही उलझा दिया है। इसी उहापोह में इंसान आज भी उलझा है और इसके दायरे से बाहर नहीं आ सकता, क्यों कि यह उलझन कुदरत की बनाई हुई है। इसीलिये उचित यही होगा कि राज को राज ही रहने दिया जाये।
एक नई बात यह है कि अपनी असफलता को छिपाने के लिये हम लोग कई कारण बता देते हैं कि इन कारणों की वजह से हम फलां कार्य नहीं कर पाये या फलां लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाये। जैसे- शिक्षा की कमी होना, वित्तीय संकट, अस्वस्थता, पारिवारिक बोझ और परिस्थितियां आदि कुछ ऐसे कारण गिना दिये जाते हैं, जिसके कारण अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाये। यह सब तो मात्र एक बहाना है। यहां यह बताना जरुरी है कि इस दुनियां में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन्होंने अत्यंत ही विपरित परिस्थिति में, गरीबी और दयनीय हालातों में रहकर अपना उज्जवल भविष्य बनाया है और विश्व में वह सब कुछ प्राप्त किया है जिसकी उधेड़बुन में हम सभी लगे हुए हैं पर हासिल नहीं हो पा रहा है। इसमें शिक्षित और अशिक्षित दोनों ही तरह के लोग शामिल हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कि किसी तरह से अब हस्ताक्षर करना सीख गये हैं। जो हस्ताक्षर करना भी नहीं जानते उन्होंने कुछ कम पढ़े-लिखे लोगों को अपने निजी सहायक के रुप में नौकरी पर रखा है। मालिक जैसा कहता है वे वैसा ही लिख देते हैं और फिर मालिक हस्ताक्षर या अंगूठा या दोनों ही लगा देता है। एक संपन्न वर्ग की सभी सुविधायें आज उसे प्राप्त है। सफलता की बुलंदियों को हासिल किया है और  पद, प्रतिष्ठा, नाम-ख्याति, सम्मान, शोहरत  और असीमित दौलत भी प्राप्त किया है यानि आर्थिक-शक्ति, शारीरिक शक्ति, राजनीतिक-शक्ति और मानसिक-शक्ति के साथ-साथ बल-बुध्दि-विद्या और विवेक भी प्राप्त किया है और जो उसे प्राप्त नहीं है उसे प्राप्त करने का सामर्थ्य उसके पास है इस तरह जीवन में निरंतर अग्रसर ही होते जा रहे हैं।
अपने से बड़े या ज्यादा शिक्षित व्यक्ति का हमेशा  आदर करना एक प्रमुख शिष्टाचार है। जिसे नज़रअंदाज नहीं करना चाहिये। उसमें भी यदि व्यक्ति पारिवारिक सदस्य है तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। यदि आपको लगता है कि फलां  व्यक्ति से मिलने से कुछ अशुभ हो सकता है इसलिये आप नहीं मिलना चाहते हैं तो मिलना जरुरी नहीं है, मत मिलिये, कोई जबर्दस्ती नहीं है।आज की परिस्थिति में हर घर -परिवार बिखरता जा रहा है, गला- काट प्रतियोगिता, आपसी   ईर्ष्या, यहां भी अपना दुष्प्रभाव  दिखा रही है। पारिवारिक सदस्य एक -दूसरे के  दुश्मन  बने हुए हैं। घृणा का स्तर इतना बढ़ चुका है कि भाई-भाई एक-दूसरे की शक्ल देखना तो दूर जान लेने के लिये उचित अवसर का इंतजार करते रहते हैं।
इस नफ़रत और घृणा के पीछे व्यक्ति के वही लक्षण भी प्रमुख भूमिका निभाते हैं जो कि हम शुरुआत में ही बता चुके हैं, जैसेः- व्यक्ति का पद, पैसा और सामाजिक स्तर। दैनिक जीवन में बोल-चाल की भाषा और बातचीत के दौरान चेहरे पर अभिव्यक्त करने और प्रस्तुतिकरण का तरीका।
जय हिन्द

विनोद














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